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विश्लेषण

आप कौन सी भाषा में सोंचते हैं?

हिंदी दिवस
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15 अगस्त 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ. और आज़ादी के साथ ही यह प्रश्न उठा क़ि इस बहुभाषी, विविध संस्कृति समेटे राष्ट्र की राजभाषा क्या होगी ? संविधान सभा के सदस्यों के काफी विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को निर्णय लिया गया जो क़ि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी. यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था, इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया. जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे जिसके बाद अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा. इस कारण हिंदी में भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा.

बड़े शहरों-महानगरों में रहने वाले लोग जो बड़ी-बड़ी कंपनी में काम कर रहे हैं, उन्हें आज के समय में हिंदी भाषा का कोई भविष्य दिखाई नहीं देता. वैसे उनकी सोच भी सहीं हैं क्योंकि उनका दायरा उन्हीं लोगो तक सीमित हैं जो ऐसी ही सोच रखते हैं. उन्हें लगता हैं की एक सफल भविष्य के लिए हिंदी का उनके जीवन में होना ज़रूरी नहीं हैं. लेकिन दूसरी ओर जब एक व्यक्ति इस हिंदी भाषी देश के भीतर झांकता हैं तो उसे भाषाई मतभेद की खाई नज़र आती हैं, और यह मतभेद इन पढ़े-लिखे लोगो को ही अकेला कर रहा हैं, क्यूंकि देश में आज भी हिंदी भाषी ज्यादा हैं. माना की आज हिंदी भाषी अध्ययन विलुप्ति की कगार पर हैं, आज तकनिकी से लेकर प्रबंधन और बैंकिंग जैसे अध्ययन अंग्रेजी भाषा में ही हो रहे हैं, लेकिन मानवीय भावनात्मक एकता हिंदी भाषा से आती हैं. मानवीय एकता तब ही आएगी जब सबमे समानता होगी, मतभेद कम होगा.

“भारत की अधिकतर जनसंख्या बोलती चाहे कोई भी भाषा हो लेकिन सोचती तो हिंदी में ही हैं. “

यह मतभेद भाषा का मतभेद हैं. अंग्रेज़ी आज और भविष्य दोनों की जरुरत हैं, लेकिन क्या जरुरत के लिए अपनी नींव को छोड़ा जा सकता हैं?? अगर हिंदी भाषा का पृथक्करण इसी तरह चलता रहा तो ग्रामीण, नगरीय और महानगरीय समाज में मतभेद में अकल्पनीय बढ़ोतरी होगी. जो देश के विकास में निःसंदेह बाधा साबित होगी.

सामाजिक जुड़ाव भाषा के माध्यम से ही मजबूत हो सकता हैं, क्यूंकि देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी हैं. जब तक इसका विकास नही होगा तब तक देश के विकास में बाधा पहुँचेगी.

आज भारत में डिजिटल इंडिया की बात हो रहीं हैं, डिजिटलाइजेशन को भारत में जोरो शोरो से लाया जा रहा हैं. इसमें शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाको का मुख्य रूप से ध्यान दिया जा रहा हैं, लेकिन हिंदी के बिना यह मुश्किल ही नहीं असंभव हैं. हम स्वयं सोचे क़ि एक ग्रामीण को इंटरनेट पर गूगल करने से पहले अंग्रेजी लिखना पढ़ना सीखना पड़े तो यह कहाँ तक संभव हैं?? असंभव नहीं हैं पर इसमें बहुत वक्त लगेगा. देश को इससे जोड़ने के लिए इसे हिंदी में लाना जरुरी हैं, तब ही पुरे देश में डिजिटल क्रांति का सपना सच हो सकेगा. आज मोबाइल, कपड़े और घरेलू सामान से लेकर तकनिकी उत्पादों को “हिंदी” के नाम से बेचा जा रहा हैं. क्योंकि हिंदी ही वो भाषा हैं जो पुरे देश को जोड़ती हैं.

ऐसे लोग जो हिंदी का ज्ञान रखते हैं या हिंदी भाषा जानते हैं, उन्हें हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है.

जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिंदी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें. लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखती है. हिंदी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है. हिंदी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिंदी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता ?

जिस तरह हम अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे, राष्ट्रीय गान, गीत को सम्मान देते हैं, वैसे ही हमारी भाषा भी सम्मानीय हैं. हम खुद जब तक इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे तब तक इसे दूसरों तक पहुँचाना मुश्किल हैं.

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अमेरिका में जाकर मातृभाषा में भाषण दिया था. यह हमारे लिए एक गर्व की बात हैं. हिंदी भाषा के उत्थान के लिए मोदी सरकार ने कदम उठाये हैं जो एक सीमा तक प्रशंसनीय हैं किंतु अधिक उपयोगी नहीं हैं. इस दिशा में अभी और कार्य करने की आवश्यकता हैं.

आज ऐसे हालात आ गए हैं कि हिंदी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्विटर/फ़ेसबुक पर “आज तो हिंदी में बोलो” जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है.

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