मत

विश्लेषण

मोदीराज में सब खुश हैं? चलिए उनसे मिलाते हैं जो नहीं हैं

अवार्ड वापसी सरकार

26 मई 2014 के बाद से देश कि आबो हवा इतने तेजी से राष्ट्रवादी हो रही है की जिन लोगो को 60 सालों से पाकिस्तान परस्ती की और देश के खिलाफ जहर उगलने की आदत सी पड़ गयी थी उनका दम सा घुटने लगा है | जाहिर सी बात है अगर आपकी जहर उगलने की आदत बन गयी है तो राष्ट्रवादी माहौल में आपको जरा भी अच्छा नही लगेगा, हर एक दिन पहाड़ जैसा गुजरेगा | और सबसे ख़ास बात यह सब राष्ट्रविरोधी जहर उगलने के बदले इस मुल्क की सरकार आपको मलाई बांटें, विदेशी दौरे करवाए, अवार्ड दे दे, भले ही आपको साहित्य की बाराखडी न आती हो और तो और आपको सिक्यूरिटी और बंगले दान में दें तो ये तो सोनेपे सुहागा है |

जनता के गाढ़ी कमाई से बिना काम किये सरकार से सब कुछ मिलने लगे और तभी अचानक से वो सरकार ही चली जाए और एक नई सरकार आ जाये तो आपको तो आदत नहीं रहेगी बिना इन सब के रहने की और अगली सरकारे हर खर्चे पर, बाबुओं पर, फ़ोकट का खाने वालों पर कटौती करने लगे, पत्रकारों की फ्री में हवाई यात्राएं बंद हो जाये, आपकी सिक्यूरिटी हटा ली जाये, अफसरों की काली कमाई बंद हो जाये, पाकिस्तान की पैरवी करने की बजाये मुंहतोड़ जवाब देने लगे, देश के भीतर के दुश्मनों को सिक्यूरिटी के बजाये उनपर कड़ी करवाई की जाये और सिर्फ योग्य व्यक्तियों को ही पुरस्कार देने लगे तो ऐसी आबों हवां में आप का दम घुटेगा ही न और आपको लगेगा जैसे पुरे देश का दम घुट रहा है | आपको लगेगा की यह क्या अजीब सा माहोल हो गया है देश में?

घोटालों से न्यूज़ चैनल भरे पड़े रहने वाले देश में ये क्या लगा रखा है मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया, फलाना ढीमका इंडिया, सिर्फ इंडिया और इंडिया, यह कैसी सरकार आ गई जिसको सिर्फ इंडिया के अलावा कुछ दीखता ही नही | न पत्रकारों को भाव देती है, न साहित्यकारों को मलाई मिल रही है, न अफसरों की दाल गल रही न बाबुओं की | यहाँ तो न आतंकियों की दाल गलती है न उनके लिए ये लोग ठीक से रो पातें है न खुल के समर्थन कर पातें है | मुंबई जैसे शहर में जहाँ आतंकी हमला करना दिवाली में पटाखे जलाने से जादा आसान था, तीन वर्ष हो गए न एक आतंकी हमला हुआ है, न कोई घोटाला हुआ है | ऐसा तो नही था मेरा भारत |

हमने जो भारत बनाया था वहां कितना खुशनुमा माहोल था | अल्पसंख्योको की सिर्फ बात करते करते हम सरकार के तलवे चाट लिया करते थे | बदले में हमें क्या क्या नही दिया सरकार ने | गरीबों की बात करते थे, गरीबों को गरीब रखते थे, हिन्दू-मुसलमानों को लड़ाते थे और सेकुलरिज्म की ढाल के पीछे छुप जाते थे | मुसलमान के नाम पर हमने अपने बैंक बैलेंस विदेशो में बनाया लेकिन मुसलमानों और गरीबों को गरीब ही रहने दिया क्यूंकि उन्हें अमीर थोड़ी करना था सिर्फ उनकी बात करने के बदले ये अवार्ड पुरस्कार और बंगले मिलते थे हमें |

कमबख्त ये सरकार बड़ी अजीब सी है अब दम घुटता है यहाँ हम जैसे साहित्यकारों का, पत्रकारों का, फिल्मकारों का हमें मुसलमानों की बात नही करने देती है उन्हें डायरेक्ट फायदा पहुंचा देती है |

अब तो मुसलमानों की ही नहीं दलितों की, हिन्दुओं की, जैनों की, सीखो की, बुद्धिस्टों की सबकी बात करती है ये सरकार | कहाँ हमने इतने सालों तक फर्जी सेकुलरिज्म दिखा-दिखा के काम चलाया था और ये सरकार सबका साथ सबका विकास करना चाहती है | अब न तो मुसलमानों की बात कर सकते है, न दलितों की ये खुद ही सबकी बात करने लगती है | कितना ठीक चल रहा था सब कुछ | किसी भी मुसलमान की हत्या होती देश में तो हम संघ वालों को दोषी ठहरा देते थे क्यूंकि सरकार हमारे साथ थी चाहे दोषी कोई भी हो संघ का लेना देना न हो |

अब कभी किसी मुसलमान की हत्या हो भी गयी तो बड़ी मशक्कत करके उसको बीफ एंगल देना पड़ता है जैसे तैसे रुदाली चल ही रही थी बीफ पर तो ये कमबख्त सरकार तीन दिन के भीतर असली मुजरिमों को ढूँढ निकालती है | और तो और चूँकि पुरानी सरकारों के अनगिनत अहसान है हम लोगों पर तो कर्ज चुकाने का दबाव भी है | और आये दिन उनके कर्ज चुकाने के चक्कर में हमें बरसो की चाटुकारिता के बदले जो पुरस्कार दिए गए थे उन्हें मन मारकर लौटाना पड़ रहा है |

अब देखो पिछले वर्षो से केरल में संघियों की हत्या हो रही है | आये दिन उन्हें चुन-चुन के मौत के घाट उतार दिया जा रहा है लेकिन हमने बड़ी मुश्किल से उन सब खबरों पर पर्दा डाल रखा है | मजाल है कोई हमारा मुंह खुलवा दे | बड़े दिनों बाद पिछली बार दादरी में एक मौका मिला था हम सब पत्रकार, साहित्यकार और फिल्मकारों ने इसे खूब बढ़िया भुनाया था | आमिर खान ने तो मुल्क छोड़ने की बात तक कर दी अपने बीवी के हवाले से इस देश को असहिष्णु घोषित करने के लिए | दरअसल हमें इस देश से तकलीफ नहीं है, हमें इस सरकार से तकलीफ है, हमें परेशानी मोदी से है और हम मोदी का विरोध करने में इतने खो जाते है की हम कब देश का भी विरोध करने लगते है हमें पता ही नही चलता | आमिर खान साब ने देश छोड़ने की बात की थी लेकिन बताया नही था की कौन सा देश सुरक्षित है हमारे लिए भारत से ज्यादा | और वो तो अवार्ड लेते नहीं वरना उन्होंने भी लौटा दिया होता एक दो अवार्ड | अख़लाक़ के नाम पर हमने खूब बवाल काटा और जो नतीजे की उम्मीद थी, मनमाफिक नतीजे भी आये बिहार में | हमारी अन्नदाताओं की सरकार को बहुमत मिल गया |

अब बारी है गुजरात की ! हमको गुजरात से मोदी और भाजपा की सरकार को उखाड़ फेकना है | एक बार गुजरात से उखाड़ दिया तो देश को दिखने के लिए आसान हो जायेगा की मोदी के गुजरात में ही मोदी की कोई नहीं सुनता ताकि देश के लोगो में मोदी के प्रति गुस्सा बनाया जाए 2019 के पहले | बस तो उसी अवार्ड वापसी गैंग पार्ट 1 की अगली कड़ी लेकर आरहे है और अवार्ड वापसी गैंग 2 की सुरुवात कर चूकी है शबनम हाशमी | मौका था बल्लभगढ़ में ट्रेन में 16 साल के मुस्लिम युवक जुनैद की हत्या का | सीट को लेकर सुरु हुए विवाद में कुछ सरफिरों ने जुनैद को पिट पिट कर मार डाला | ये पूरी तरह लॉ एंड आर्डर का मामला था | इससे कुछ लेना देना नही था की जुनैद किस समाज का हिस्सा है क्यूंकि वो सबसे पहले एक इंसान है और वो भी इस देश का नागरिक है | उसे अपनी सुरक्षा का हक़ संविधान ने दिया है लेकिन सीट को लेकर मारे गए मामले को हमने तुरंत बीफ एंगल दे दिया क्या करे कर्ज अदा करने का वक्त है |

जामा मस्जिद के सामने मोहम्मद अयूब पंडित की पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी, केरल में संघियों की हत्या की जा रही है | डॉक्टर नारंग को पीट पीट कर मार दिया गया | प्रशान्त पुजारी जिसे कुछ शांतिदूतों ने गौ तस्कर के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट करने पर मौत के घाट उतार दिया था कितनी चतुराई से हमने इन सभी मुद्दों को दबा दिया | ऐसे अनगिनत केस है जब हम सेलेक्टिव आउटरेज करते है | रिंकू सहा, ट्विंकल कुमार और कुमुदनी का रेप केस या राजधानी दिल्ली में डॉक्टर पंकज नारंग को शांतिदूतों द्वारा पिट-पिट कर मार डालने की घटना हो हमने कभी चुप्पी नही तोड़ी क्यूंकि वो हमारे फायदे का नहीं था हम सिर्फ और सिर्फ मुसलमान मारा जाए, वो भी किसी हिन्दू के हाथों तब ही बोलते है यही हमारा धर्म है | दलित विहिप नेता को आगरा में मारा गया हमने एक शब्द नहीं कहा | हाल ही में जुनैद के मारे जाने के 3 दिन पहले कश्मीर में डीएसपी अय्यूब पंडित को पिट पिट कर दर्दनाक मौत दी लेकिन हमने इसलिए नहीं कहा क्यूंकि मारनेवाले भी शांतिदूत ही थे | उसके पहले भी अफसर उम्मर फ़याज़ और फिरोज अहमद दार को मारा गया था हमने चूं तक नहीं की थी | इस पर से आप सोच सकते है हम मौका परस्त है हम वफादार है अपनी पुरानी सरकारों के और हम कर्ज चुका रहे है उनके अहसानों का |

हम सिर्फ अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से ही व्यथित होते है | हमें कोई लेना देना नही अल्पसंख्यकों से न आम जनता से हमें अपनी राजनीती की रोटी सेंकनी अपने आकाओं के लिए और उन्हें सत्ता में बनाये रखने के लिए हमें जो करना पड़े करेंगे | चाहे अवार्ड वापिस कर देश को असहिष्णु ही क्यूँ न बनाना पड़े | इसलिए अब शबनम हाश्मी ने अवार्ड वापसी कार्यक्रम 2 का शुभारम्भ कर दिया है | अब देखते ही देखते और भी साहित्यकार, फिल्मकार मिलकर अवार्ड वापिस करेंगे | भले ही इन अवार्ड और इन साहित्यकारों को कोई जानता न हो लेकिन भारत के अन्दर एक माहोल बनाने के लिए इतना ही काफी है, वैसे मीडिया तो है ही साथ में | अब देखना ये है जुनैद के नाम पर रचाया गया यह अवार्ड वापसी 2 वाले ड्रामे से हम असहिष्णुता पार्ट 2 को सफल बना पाते है या नहीं | हालाँकि अब वो बात नही रही जनता सब समझने लगी है और यही तो दिक्कत है |

बिहार में काम चल गया था लेकिन गुजरात जैसे राज्यों में अवार्ड वापसी और असहिष्णुता से काम चलाना टेढ़ी खीर साबित होगी |

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Nitesh Kumar Harne

साहित्य प्रेमी, राजनीति विशारद, गर्वान्वित भारतीय
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