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[वैज्ञानिक विश्लेषण]: इसलिए हिन्दू नहीं करते एक गोत्र में विवाह

गोत्र प्रणाली
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“आधे टार्गेरियन पागल हो गए थे ना?”

— सरसी लान्निस्टर का कौटुम्बिक व्यभिचार पर एक कटाक्ष

ये उदहारण एचबीओ श्रृंखला, गेम ऑफ़ थ्रोन्स से लिया गया है, जहाँ सरसी नामक एक महिला किरदार जिसके अपने सहोदर भाई के साथ यौन सम्बन्ध हैं, कौटुम्बिक व्यभिचार के बारे में अपनी राय रख रही है। अपने परिजनों से विवाह नहीं करते – यह विश्वास पध्दति कितनी सही है? लगभग हर संस्था और सभ्यता ने घनिष्ट रिश्तेदारों से विवाह संबंध स्थापित करने की निंदा की है? गोत्र व्यवस्था जो वैदिक सभ्यता के दौरान विकसित हुई है, जो ऐसे विवाहों को रोकती है, क्या आनुवंशिक रूप में मिली बीमारियों के संकट को कम करने में वैज्ञानिक रूप से कारगर है? १०वीं कक्षा के जीव विज्ञान के ज्ञान से भी कोई व्यक्ति समझ सकता है कि ऐसा क्यों है। जब कभी हम विज्ञान और धार्मिक मान्यताओं और पध्दतियों के बीच के संबंध के बारे में बात करते हैं, तो यह अनिवार्य होता कि हम लक्ष्यात्मक सत्यता के बारे में बात करें।

गोत्र व्यवस्था समान वंशावली के लोगों की पहचान करने की एक प्रणाली है जो एक ही पुरुष-पूर्वज के वंशज हैं। हालांकि, एक ही गोत्र के लोगों को चचेरे भाई के अलावा गोद लिए हुए बेटे और शिष्य भी हो सकते हैं परन्तु यह संभावना है कि वे चचेरे भाई बहन भी हो सकते हैं, इसीलिए एक ही गोत्र में विवाह करने से हमेशा बचा जाता है। उदाहरण के लिए, मौद्गल्य मेरा गोत्र है, जिसका अर्थ है कि इस समान गोत्र वाला कोई भी मेरे दूर का चचेरा भाई हो सकता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियों में गोत्र व्यवस्था का काफी विशिष्टता से पालन होता हैं क्योंकि, शायद, वैदिक काल में, जाति व्यवस्था अभी के जैसी नहीं थी और निम्न जाति शायद में वो लोग थे जो अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर सके और शायद इसी वजह से इनका अपने परिवार के नाम पर दावा करने का अधिकार छूट गया। यही कारण है कि जब चंद्रगुप्त मगध के राज सिंहासन पर बैठे तो उनके परिवार को मौर्य नाम से प्रस्तुत किया गया।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर। २०१७ में यह पुरातन विश्वास पध्दति कहां खड़ी है? क्या यह प्रणाली स्वेच्छा से शादी को इच्छुक वयस्कों को शादी करने के लिए अनैतिक तरीके से रोकता है? क्या इसके वैज्ञानिक अनुमोदन के दावे सही हैं? जब सम्पूर्ण संसार में गोत्रों के अस्तित्व के दायरे से बाहर विवाह हो रहें है, तो क्या भारत कि यह पध्दति सही मायने में कोई प्रभाव डाल रही है? आइये बुनियादी विज्ञान के बारे में पहले बात करते हैं।

प्रकृति का चुनाव योग्यतम की उत्तरजीविता है (जिसे डार्विन ने सर्वाइवल ऑफ़ थे फिटेस्ट कहा है)। जीवन एक कोशिका के रूप में शुरू हुआ। यह आनुवांशिक पदार्थों में परिवर्तन के माध्यम से लाखों वर्षों में यह विभिन्न जीवन रूपों की किस्मों में विकसित हुआ। ये परिवर्तन कई तरह के होते हैं। केवल वे ही जीवन रूप है जिनके परिवर्तन जीवन के लिए उपयुक्त थे वे बचे रहे, जबकि बाकियों को विलुप्त होना पडा। चयनात्मक उत्परिवर्तन का एक महान उदाहरण मच्छरों का है जो सबसे ठन्डे टुंड्रा बर्फिस्तान से लेकर तिलतिला देने वाले सहार और थार रेगिस्तान और वर्षावनों में जीवित रहने के लिए विकसित हुए हैं। ये तेजी से विकसित होते रहते हैं। जो मच्छर टिकिया और अगरबत्ती के सामने पंद्रह साल पहले ढेर हो जाते थे, आज उन्हें मारने में खासी मसक्कत लगती है, क्यूंकि उनके डीएनए सीखते रहते हैं और जो मच्छर बच कर जीवित रह जाते है वह शुक्राणुओं के माध्यम से हर नए बदलाव को अपने बच्चों तक पहुंचाते हैं। नई पीढ़ी में केवल उन्हें ही शामिल किया जाता हैं जो प्रतिरोधक क्षमता से लैस हैं।

लाखों वर्षों से चल रहे विकास में, बहु-कोशीय जीवधारियों ने यौन प्रजनन का उपयोग शुरू आनुवंशिक सामग्री का बेहतर मिश्रण किया जा सके। पुरुष और महिला दोनों लिंग जानवरों और पौधों में भी विकसित हुए हैं क्योंकि अलैंगिक प्रजनन तकनीकी रूप से सिर्फ क्लोनिंग है। इस प्रजनन तकनीक ने माता पिता से ५० ५० प्रतिशत आनुवंशिक वंशाणु लिए, जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के वंशाणु तैयार किए गए। इसके साथ ही कई वंशागत परिवर्तन को समान रूप से एक साथ जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार के प्रजनन ने प्रजातियों की नस्ल के अस्तित्व को बचाने के लिए एक बेहतर अवसर सुनिश्चित किया है। (इसमें कुछ अपवाद भी हैं)।

कई प्रजातियां आत्म-निषेचन / परागण या प्रजनन से बचने के तरीके विकसित करती हैं। कुछ पौधों में अपने स्वयं के पराग का पता लगाने के लिए रसायन होते हैं। कुछ जानवरों के पास परिजनों को पहचानने के लिए रसायन होते है। उदाहरण के लिए, कुछ स्तनधारियों में एमएचसी और कुछ कीड़ो में क्यूटीक्युलर हाइड्रोकार्बन पाया जाता है। पुरुष और महिला दोनों से एक जैसे आनुवंशिक डेटा होने से बचने के लिए क्यों प्रकृति में इतने मजबूत कदम उठाए गए हैं? ये सिर्फ और सिर्फ आनुवंशिक दोष होने की संभावना को कम करने के लिए है, हालांकि सिर्फ आन्तरिक प्रजनन आनुवंशिक दोष के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं है, यह सिर्फ होमोजीगॉसिटी को बढ़ा देता है। रानी सरसी हमें माफ़ करना 🙂

होमोजीगॉसिटी को ऐसे समझा जा सकता है जिसमें एक व्यक्ति के पास एक ही जीन के दो एक जैसे एलील हो, एलील जीन का एक संस्करण होता है। हमारे पास 22 गुणसूत्रों और सेक्स गुणसूत्रों की एक जोड़ी की दो प्रतियां हैं, जिनमें से आधेआधे माता-पिता से आते है। इसका मतलब है कि हम प्रत्येक जीन के 2 एलील्स होते हैं। अब ऐसे कई हानिकारक सुप्त एलेलीस होते हैं जो एक लक्षण की तरह नहीं दिखते (सिर्फ एक वाहक की तरह होतें हैं), लेकिन जब इनका समागम दूसरे एलेलीस से होता है तब ये लक्षण की तरह दिखने लगते हैं, यहाँ लक्षण का तात्पर्य रोग से है। जब ऐसे एलेलीस का कोई वाहक अपने भाई या बहन के साथ सहवास करता है तो दूसरे सहभागी के वाहक बनने की  संभावना लगभग ५०% होती है  क्योंकि उनके अन्दर एक ही माता-पिता के जींस हैं। ऐसे समागम से रोग पैदा करने की संभावना अति प्रबल होती है।

भारत पर वापस नज़र डालते हैं, गोत्र प्रणाली सदियों से समान जननिक सामग्री वाले लोगों का विवाह रोकने की एक प्रक्रिया रही है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वगोत्र के विवाह के मामले पर यह कहते हुए फैसला सुनाया कि ‘यह तर्क वैज्ञानिक आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है’ और अपहरण के आरोपी को जमानत प्रदान दी, जिसने अपने ही गोत्र की लड़की के साथ प्रेम कर शादी कर ली थी। २०१७ में अब व्यक्तियों के आनुवंशिक बनावट को जानना और समानताओं की तुलना करना संभव है। आगामी पीढ़ियों के साथ, यह और आसान और सस्ता हो जाएगा। यह कार्य, आनुवंशिक क्लीनिक पेशेवर रूप से करते हैं। वे आनुवंशिक दोषों के जोखिम की गणना करते हैं और इसे कम करने का प्रयास करते हैं। भ्रूण में बहुत से दोष बहुत जल्दी ही पता लगा सकते हैं। एक ही गोत्र के युगल को मारने के बजाये, उनकी सच्ची आनुवांशिक रचना का विश्लेषण करना, २१वीं सदी में इसका पालन किया जाना चाहिए।

परन्तु गोत्र प्रणाली, अपनी सभी खामियों के साथ, अब भी रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में काम कर सकती है, और कर भी रही है, हालाकि ज्यादा वैज्ञानिक तरीको को उपयोग करना बेहतर होगा।

Comments

"Writer | Studies CS Engineering | Love Coding | Atheist | Nationalist | Coffee Addict | Wants to See Humanity Progress through Science"
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1 Comment

  1. बहुत अच्छा लेख वैज्ञानिक आधार पर थैंक यू

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