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कांग्रेस ने कैसे सुनिश्चित किया अपना पतन

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कर्नाटक चुनाव के नतीजों के सामने आने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) 2019 की लड़ाई हार गयी है। मुख्यधारा की मीडिया और कांग्रेस के समर्थकों ने एक ऐसी खबर को बढ़ावा देने की कोशिश की कि कांग्रेस कर्नाटक में जीत जाएगी। कर्नाटक चुनावों को बड़े पैमाने पर कांग्रेस के लिए वापसी के के तौर देखा जा रहा था। कर्नाटक चुनाव में जीत को भारतीय राजनीति में सिद्धारमैया एक बड़े नेता के तौर पर उदय और राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के आगमन के रूप में दिखाया जा रहा था। हालांकि, कर्नाटक चुनाव के नतीजे जब सामने आये तब चुनाव से पहले प्रचारित मिथक धरे के धरे रह गये और साथ ही इसने राज्य में कांग्रेस की गिरती छवि को भी उजागर कर दिया है।

कांग्रेस और जेडीएस बीजेपी को स्पष्ट बहुमत तक पहुँचने से रोकने में कामयाब रहे हैं। जैसा की rightlog.in द्वारा बताया जा चुका है कि कांग्रेस के पास जेडीएस के साथ गठबंधन की सरकार बनाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए बीजेपी के पास स्पष्ट रूप से मतदाताओं का जनादेश है। कर्नाटक में सरकार किसी की भी बने लेकिन ये तो स्पष्ट है कि कांग्रेस वर्तमान के राजनीतिक माहौल में पूरी तरह से हार चुकी है। कांग्रेस कर्नाटक में मुख्यमंत्री के पद को लेकर भी समझौता करने के लिए तैयार हो गयी है जिसके बाद जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस ने हामी भर दी। इस प्रकार, 78 जीते हुए विधायकों के साथ कांग्रेस जेडीएस के मुख्यमंत्री उम्मीदवार को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार हो गयी जबकि जेडीएस चुनाव में केवल 37 सीटें ही जीत पायी है। इससे जाहिर है कैसे कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाने के लिए क्षेत्रीय स्तर की पार्टी के साथ समझौता कर अपने आत्मसम्मान को भी दांव पर लगा दिया।

आईएनसी अपनी स्थापना के बाद से अब तक की सबसे बुरी स्थिति से गुजर रही है। इससे पहले इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाये गये इमरजेंसी और राजीव गांधी सरकार के शर्मनाक पतन के बाद कांग्रेस की स्थिति को झटका लगा था, तब भी कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही थी। हालांकि, कोई भी राजनीतिक उथल-पुथल कांग्रेस के लिए लम्बे समय तक नहीं रहा है। आमतौर पर, कांग्रेस एक कमजोर शक्ति के रूप में वापस आई है और इस सत्य को अक्सर ही ये राष्ट्रीय पार्टी ख़ारिज करते आई है। गौर हो कि, 2014 के बाद से पिछले चार वर्षों में कांग्रेस अपने धूमिल होते अस्तित्व को फिर से बेहतर बनाने में नाकाम रही है।

जब आईएनसी का भारतीय राजनीति में पतन गहराता जा रहा है, तो राजनीतिक टिप्पणीकारों ने विशेष रूप से वो जिनके मन में कांग्रेस के प्रति नर्म भाव हैं उन्होंने कहा कि अभी समय बीजेपी के पक्ष में है और ये अस्थायी है। कांग्रेस पार्टी जो कभी भारत की राजनीतिक विरासत थी आज उसकी स्थिति ऐसी बन गयी है कि उसे क्षेत्रीय पार्टी के सामने झुकना पड़ रहा है।

2014 के बाद से कांग्रेस लगभग सभी राज्य हार चुकी है। लगातार मिली हार के बाद को देखें तो कांग्रेस पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी से चौदह विधानसभा चुनाव हारी है। 2014 में, कांग्रेस का शासन 15 राज्यों में था, जबकि बीजेपी का शासन केवल 8 राज्यों में था। हालांकि, चार साल की छोटी अवधि में जो बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं वो पहले कभी नहीं हुए हैं। आज बीजेपी का शासन 21 राज्यों में है, जबकि कांग्रेस का शासन सिर्फ दो राज्य और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में है। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए बीजेपी को सिर्फ 9 विधायकों की जरूरत है ऐसे में कांग्रेस कर्नाटक में अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रही है। अगर कांग्रेस कर्नाटक में हार जाती है तो कांग्रेस के पास राजनीतिक रूप से कोई भी महत्वपूर्ण राज्य नहीं रह जाएगा। जहां तक ​​पंजाब का सवाल है, ये किसी से छुपा नहीं है कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पंजाब अपने बल पर जीता और वहां नियम बनाये। कांग्रेस हाई कमांड और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की इसमें कोई भूमिका नहीं रही है।

जहां तक 2019 के चुनावों की बात है तो कांग्रेस का पतन और गहराता चुका होगा। यहां तक कि विपक्ष अपनी लगातार हार से निराश होकर यदि बीजेपी विरोधी मोर्चे तैयार भी करता है तो भी विपक्ष के पास ऐसा कोई नहीं होगा जो इस मोर्चे का नेतृत्व कर सके। हर हार के साथ कांग्रेस की स्थिति बदतर होती जा रही है। 2014 के चुनावों के बाद शुरुआत में कांग्रेस को बीजेपी के सामने प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में पेश किया जा रहा था। इसके बाद कांग्रेस ने खुद को बीजेपी विरोधी दल के रूप में पेश करने की कोशिश की और आखिरकार कांग्रेस इस लड़ाई में उस स्तर पर पहुंच गयी है जहां उसे क्षेत्रीय पार्टी  के सामने भी झुकना पड़ रहा है।

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