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विश्लेषण

क्या ‘संयुक्त विपक्ष’ का विचार वास्तव में सफल होगा?

मायावती राहुल गांधी बीजेपी
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वर्तमान के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए हम ये कह सकते हैं कि राहुल गांधी किसी भी राजनीतिक स्पेक्ट्रम पर बात करने के लिए उपयुक्त नहीं है। बेहतर नेतृत्व करने में असफल रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को दोषी ठहराने वाले नेताओं की सूची में अब बसपा सुप्रीमो मायावती का नाम भी जुड़ गया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कर्नाटक में बीजेपी के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राहुल गांधी को दोषी ठहराया है। एक बयान में उन्होंने कहा, “मैं कांग्रेस को ये सुझाव देना चाहती हूं कि चुनाव प्रचार के दौरान अपनी राजनीतिक योग्यता के लिए ऐसी भाषा का उपयोग न करें जो बीजेपी और आरएसएस को लाभान्वित करता हो।” उन्होंने आगे कहा, “ये स्पष्ट है कि कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान जेडीएस को बीजेपी की बी-टीम के रूप में सम्बोधित किया गया था खासकर मुस्लिम आबादी क्षेत्र में जी वजह से वोट में विभाजन हुआ है। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में बीजेपी के उम्मीदवारों की भारी जीत हुई है। बीजेपी को 104 सीटें कभी नहीं मिलती यदि कांग्रेस प्रचार के दौरान इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करती।” बीएसपी कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) के साथ गठबंधन में है। बसपा ने यहां 20 सीटों के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन वो सिर्फ एक सीट पर ही जीत दर्ज करने में कामयाब हो रही है।

बसपा ने अधिकतर मुस्लिम आबादी के महत्वपूर्ण अनुपात वाले क्षेत्रों में चुनाव लड़ा लेकिन बीजेपी ने यहां भी अधिकतर क्षेत्रों में जीत दर्ज की। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जेडीएस को बीजेपी की बी-टीम कहा था और शायद मायावती की नाराजगी के पीछे की वजह यही है। मायावती ने कांग्रेस को दोषी ठहराते स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने को लेकर चली सभी चर्चाओं और वार्ता के बावजूद, ऐसा लगता है कि अभी तक विपक्ष की एकमत राय नहीं बन पायी है। कांग्रेस विपक्ष के तौर पर मुख्य विकल्प से हटाए जाने के विचार से सहमत नहीं है क्योंकि ये विचारधारा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ की दिशा में एक और कदम हो सकता है। दूसरी तरफ क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को मुख्य विपक्ष के तौर पर नहीं देखती हैं क्योंकि कांग्रेस के पास सिर्फ दो राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश (पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी) ही शेष रह गया है। उत्तर प्रदेश में 2017 में हुए चुनाव के बाद से कांग्रेस को एक भार के रूप में देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन वो चुनाव में बुरी तरह से हार गये थे। सपा 403 में से केवल 54 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पायी थी जबकि पिछले चुनावों में सपा ने 224 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

भारतीय राजनीति के इतिहास में संयुक्त गठबंधन की विचारधारा पर पहले भी तीन बार परिक्षण किया जा चुका है लेकिन संयुक्त गठबंधन सरकार में 5 वर्ष पूरा करने से पहले ही टूट चुका है। 1977 में ‘आपातकाल‘ के बाद संयुक्त गठबंधन की विचारधारा को काफी महत्व दिया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अगुवाई में कांग्रेस सरकार के खिलाफ पूरा विपक्ष जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकजुट हुआ था। जनता पार्टी ने तब 542 में से 345 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि कांग्रेस महज 189 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पायी थी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने लेकिन पार्टी के बढ़ते आंतरिक विवादों के कारण सरकार अपना तीन साल का कार्यालय भी पूरा नहीं कर सकी।

1989 के आम चुनावों के बाद भी ऐसा गठबंधन बनाने की कोशिश की गई थी जब कांग्रेस 197 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन बहुमत से दूर थी। उस समय ‘नेशनल फ्रंट’ के तहत केंद्र में सरकार बनाने के लिए जनता पार्टी, टीडीपी, डीएमएके, असम गण परिषद (एजीपी) कई अन्य क्षेत्रीय दल गठबंधन के लिए साथ आये थे जिसका बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने समर्थन किया था। मंडल आयोग के प्रसिद्ध वी पी सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन सत्ता साझा करने के लिए आंतरिक लड़ाई की वजह से सरकार दो साल से भी कम समय में ही गिर गयी।

1996 में एक बार फिर से इस विचारधारा ने तुल पकड़ा था और तब बीजेपी सत्ता में थी। अटल बिहारी वाजपयी के नेतृत्व में बीजेपी ने 1996 में हुए आम चुनावों में 161 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। वहीं, 140 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे स्थान पर थी। इसके बाद सरकार बनाने के लिए संयुक्त मोर्चा के तहत समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कझागम, असम गण परिषद, तमिल मनीला कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और अधिकांश वामपंथी दल समेत सभी क्षेत्रीय पार्टी एकजुट हुई थीं लेकिन इस बार फर्क सिर्फ ये था कि कम्युनिस्ट पार्टियां बाहर से समर्थन करने की बजाए सत्ता साझा कर रही थीं। प्रधानमंत्री पद के लिए उचित उम्मीदवार की खोज शुरू हुई, सभी पार्टियां पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को लेकर सहमत हुईं। सीपीएम ने इस निर्णय को मानने से मना कर दिया था क्योंकि वो गठबंधन सरकार में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के निर्णय से सहमत नहीं थे। आखिरकार एचडी कुमारस्वामी के पिता एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद से अटल बिहारी वाजपेयी को दूर रखने के लिए इस गठबंधन को बाहर से अपना समर्थन दिया, लेकिन एक बार फिर से  आंतरिक लड़ाई शुरू हो गयी और सरकार दो साल से भी कम समय में ही गिर गयी।

ऐसे में जिसे भी भारतीय राजनीति के इतिहास की जानकारी होगी उसे इस बात से भी अवगत होना चाहिए कि संयुक्त गठबंधन की विचारधारा शायद ही कभी सफल रही है। इस बार भी परिदृश्य कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है ऐसे में पहले की तरह ही इस बार भी संयुक्त गठबंधन की विचारधारा विफल होने के लिए बाध्य है क्योंकि सभी विपक्ष कई मुद्दों को लेकर एकमत नहीं है। मायावती राहुल गांधी से, चंद्रबाबू नायडू चंद्रशेखर राव से खुश नहीं हैं, लालू प्रसाद यादव भी राम विलास पासवान से खुश नहीं हैं और ये सूची अंतहीन है। ऐसे में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में विपक्ष आपस के सभी मतभेद भुलाकर सरकार के खिलाफ एकजुट हो पाती हैं या नहीं।

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