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एनडीटीवी का वित्तीय संकट से उबरने का आखिरी बेतुका प्रयास

एनडीटीवी सब्सक्रिप्शन

एक सार्वजनिक नोटिस के मुताबिक, नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड जो एनडीटीवी इंडिया के नाम से मशहूर है अब 15 सितंबर 2018 के बाद से पे-चैनल बनने वाला है। वामपंथी केबल और उदार बुद्धिजीवियों के पसंदीदा चैनल एनडीटीवी की कम होती विश्वसनीयता के कारण दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। एनडीटीवी ने पहले भी वित्तीय संकट की स्थिति को सामने रखा था, 30 सितंबर, 2017 को दूसरी तिमाही में एकीकृत शुद्ध घाटा 23.14 करोड़ रुपये हो गया था, जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में 22.91 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था। कंपनी दर्शकों की संख्या में कमी को झेल रही है साथ ही विज्ञापनदाताओं ने भी चैनल से दुरी बनाना शुरू कर दिया है। फ्री-टू-एयर (एफटीए) से पे-चैनल में बदलाव के पीछे का उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाना है क्योंकि कई वर्षों से कंपनी को घाटा हो रहा है।

एनडीटीवी सब्सक्रिप्शन

एनडीटीवी कई वर्षों से दर्शकों की संख्या और मुनाफे में कमी दोनों से जूझ रही है। इस वर्ष एनडीटीवी ने अपनी सहायक कंपनी रेड पिक्सेल्स (Red Pixels) में 7.38% की हिस्सेदारी अपने दिल्ली दफ्तर परिसर के भूस्वामी एआर चढ्ढा ऐंड कंपनी को बेच दी थी। मीडिया कंपनी ने आधिकारिक तौर पर एक बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) फाइलिंग में कहा था कि कंपनी बिक्री से मिले पैसों का उपयोग किराये के भुगतान और कंपनी कार्यशैली को बढ़ाने के लिए करेगी। वर्ष 2017 में दर्शकों की संख्या में गिरावट की वजह से कंपनी ने लागत-कटौती और टर्नअराउंड योजना का सहारा लिया था। एनडीटीवी ने मुख्य क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी पुनर्गठन रणनीति के तहत 25 प्रतिशत स्टाफ में कटौती की घोषणा की थी। ये एनडीटीवी की तरफ से उसके बुरे समय की शुरुआत का पहला संकेत था। पिछले वर्ष इंग्लिश चैनलों के संबंध में एनडीटीवी 24×7 फिसलकर पांचवे स्थान पर चला गया है और ये वित्तीय घाटे को स्पष्ट दिखाता है।

फ्री-टू-एयर (एफटीए) और सब्सक्रिप्शन आधारित चैनल के बीच बड़ा अंतर राजस्व का स्रोत होता है जिसपर चैनल निर्भर करता है। फ्री-टू-एयर चैनल राजस्व के लिए लाइसेंस शुल्क और विज्ञापन आय पर निर्भर होता है जबकि सब्सक्रिप्शन आधारित चैनल को ऑन टाइम सदस्यता शुल्क के साथ सामग्री रखना है। दर्शकों को इस मीडिया कंपनी का एजेंडा समझ आ गया है जोकि निष्पक्षता से काफी दूर निकल चुकी थी और इस एजेंडा संचालित पत्रकारिता से दर्शक तंग आ गये थे यही वजह है कि एनडीटीवी इंडिया को जनता और विज्ञापनदाताओं से भी सुस्त प्रतिक्रिया मिल रही है और दर्शक अब अन्य चैनलों की ओर रुख कर रहे हैं। इन्हीं कारणों की वजह से प्रणय और राधिका रॉय के पास सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल को अपनाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था।

सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल अपनाना अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए इस मीडिया कंपनी के मालिकों का एक आखिरी प्रयास है लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि इस विकल्प से भी इस मीडिया कंपनी को कोई फायदा नहीं होने वाला है क्योंकि वो जिस तरह की खबरें दिखाता है उससे चैनल को घाटा ही होगा। पे-चैनल सफल रहता है क्योंकि इस तरह के चैनल कुछ खास खबरें ही दिखाते हैं जैसे भारत में क्रिकेट सीरीज, कुछ टेलीविज़न शो लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि आज की पत्रकारिता की प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में सब्सक्रिप्शन आधारित न्यूज़ चैनल शायद ही ज्यादा चलें। आजकल लोग जिन न्यूज़ चैनल के मत और सामग्री से सहमत होते हैं वो उसी चैनल को अक्सर देखते हैं। सोचने वाली बात है कि जब खबरें मुफ्त में ही कई न्यूज़ चैनल्स द्वारा दिखाई जा रही हो ऐसे में लोग क्यों उन्हीं खबरों को देखने के लिए शुल्क देंगे? और तब जब समय के साथ लोग एनडीटीवी के मत से ज्यादा सहमत न हो। ऐसे में हो सकता है कि जो कंपनी पहले से ही वित्त संकट से जूझ रही हो अब जल्द ही उसे आने वाले दिनों में और मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़े।

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